बुधवार, 15 जुलाई 2026

आजकल सारे आम कैल्सियम कार्बाइड से पकाए जाते है तो क्या यह आम के अंदर भी प्रवेश कर जाता है ? चूंकि आजकल बाजार में बड़े पैमाने पर आमों को पकाने के लिए इस केमिकल का इस्तेमाल चोरी-छिपे किया जाता है, इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है। इसका सीधा जवाब है: हां, कुछ हद तक यह आम के अंदर भी प्रवेश कर सकता है, लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर आम के छिलके और उसके ठीक नीचे वाले हिस्से पर होता है। यह आम के अंदर कैसे पहुंचता है और कितना खतरनाक है, इसे नीचे दिए गए पॉइंट्स से आसानी से समझा जा सकता है: केमिकल आम के अंदर कैसे प्रवेश करता है? गैस के रूप में सोखना (Absorption): जब आम को पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड की पुड़िया रखी जाती है, तो उससे एसिटिलीन गैस निकलती है। आम के छिलके में छोटे-छोटे छिद्र (pores) होते हैं। यह गैस उन छिद्रों के जरिए आम के अंदर तक चली जाती है ताकि आम अंदर से भी मुलायम हो सके। जहरीली अशुद्धियों का रिसना: कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और फास्फोरस जैसी भारी धातुएं (heavy metals) होती हैं। यदि आम के छिलके पर नमी हो, तो यह केमिकल घुलकर छिलके को पार करता हुआ आम के गूदे (pulp) के ऊपरी हिस्से तक पहुंच जाता है। काटते समय ट्रांसफर होना: अक्सर जब हम बिना अच्छी तरह धोए आम को चाकू से काटते हैं, तो छिलके पर लगा केमिकल चाकू के जरिए सीधे आम के अंदरूनी गूदे में लग जाता है। क्या अंदर का गूदा खाने से सीधा जहर शरीर में जाता है? सौभाग्य से, प्रकृति ने आम के छिलके को काफी मोटा और सुरक्षात्मक बनाया है। गूदे का अंदरूनी हिस्सा: आम का जो हिस्सा गुठली के पास होता है, वहां तक इस केमिकल का असर बहुत ही कम या ना के बराबर पहुंच पाता है। छिलके के ठीक नीचे का हिस्सा: छिलके से सटा हुआ जो गूदा (outer pulp) होता है, उसमें केमिकल के अंश और अशुद्धियां सबसे ज्यादा जमा होती हैं। इसलिए जब लोग आम को बिना धोए दांतों से छीलकर खाते हैं, तो यह सीधे उनके पेट में चला जाता है। केमिकल वाले आम के नुकसान से बचने के अचूक तरीके चूंकि बाजार में केमिकल वाले आम धड़ल्ले से बिक रहे हैं, इसलिए खुद को बचाने के लिए आपको इन 3 नियमों का पालन हमेशा करना चाहिए: 1 से 2 घंटे पानी में भिगोएं: आम खरीदने के बाद उसे कम से कम 1-2 घंटे के लिए पानी से भरी बाल्टी में छोड़ दें। पानी कैल्शियम कार्बाइड और उसकी गैसों को सोखकर बेअसर कर देता है। दांतों से कभी न छीलें: आम को कभी भी मुंह से काटकर या दांतों से छीलकर न खाएं। हमेशा चाकू से उसका छिलका उतारें। छिलके के पास का गूदा छोड़ दें: आम को छीलते समय छिलके के साथ बहुत हल्का सा गूदा भी निकाल दें, ताकि अगर बाहरी परत पर कोई केमिकल बचा भी हो, तो वह साफ हो जाए। कैल्सियम कार्बाइड अगर शरीर में चले जाए तो क्या क्या नुकसान है ? कैल्शियम कार्बाइड (CaC_2) एक बेहद खतरनाक और जहरीला औद्योगिक केमिकल है। अगर यह गलती से भी शरीर के अंदर चला जाए (चाहे वह दूषित फल खाने से हो, सांस के जरिए हो, या सीधे निगलने से), तो इसके गंभीर और जानलेवा नुकसान हो सकते हैं। जब कैल्शियम कार्बाइड पेट में मौजूद पानी या एसिड से मिलता है, तो यह एसिटिलीन गैस (C_2H_2) बनाता है। इसके अलावा, इसमें आर्सेनिक और फास्फोरस जैसी बेहद जहरीली अशुद्धियां भी मिली होती हैं। शरीर में जाने पर इसके नुकसानों को हम दो हिस्सों में समझ सकते हैं: 1. तुरंत होने वाले नुकसान (Acute Effects) मुंह और पेट में गंभीर जलन व छाले: यह एक तीव्र क्षारीय (alkaline) पदार्थ है, जो मुंह, भोजन नली (esophagus) और पेट की अंदरूनी परत को बुरी तरह जला देता है। इससे पेट में असहनीय दर्द, उल्टी (कभी-कभी खून की उल्टी) और दस्त हो सकते हैं। चक्कर आना और सिरदर्द: इससे निकलने वाली गैसों के कारण शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है, जिससे तुरंत तेज सिरदर्द, चक्कर आना, मानसिक भ्रम और कमजोरी महसूस होती है। सांस लेने में तकलीफ: अगर इसके कण या गैस सांस के जरिए फेफड़ों में चले जाएं, तो फेफड़ों में पानी भर सकता है (Pulmonary Edema), जिससे सांस फूलने लगती है और दम घुटने जैसा महसूस होता है। 2. लंबे समय में होने वाले नुकसान (Chronic Effects) यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक ऐसे फल खाता है जिन्हें कैल्शियम कार्बाइड से पकाया गया है, तो शरीर में धीरे-धीरे जहर (Slow Poisoning) फैलने लगता है: न्यूरोलॉजिकल डैमेज (यादाश और नसों पर असर): इसमें मौजूद आर्सेनिक और फास्फोरस सीधे हमारे नर्वस सिस्टम पर हमला करते हैं। इससे हाथ-पैरों में झुनझुनी, याददाश्त कमजोर होना, नींद न आना, और गंभीर मामलों में दौरे (seizures) पड़ना या कोमा में जाने की नौबत आ सकती है। लिवर और किडनी को नुकसान: शरीर में पहुंचे जहर को साफ करने का काम लिवर और किडनी का होता है। लगातार केमिकल के संपर्क से ये दोनों अंग काम करना बंद कर सकते हैं (Organ Failure)। कैंसर का खतरा: कैल्शियम कार्बाइड को एक संभावित कार्सिनोजेन (Carcinogen - कैंसर पैदा करने वाला तत्व) माना गया है। इसके नियमित सेवन से पेट, आंतों और गले का कैंसर होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। गर्भवती महिलाओं के लिए बेहद खतरनाक: इसके असर से गर्भ में पल रहे बच्चे में जन्मजात विकृतियां (birth defects) हो सकती हैं या गर्भपात (miscarriage) का खतरा बढ़ जाता है। ⚠️ आपातकालीन सलाह: अगर किसी ने गलती से सीधे कैल्शियम कार्बाइड खा लिया है, तो उसे तुरंत नजदीकी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में ले जाएं। खुद से उल्टी करवाने की कोशिश बिल्कुल न करें, क्योंकि इससे भोजन नली दोबारा जल सकती है। बाजार में केमिकल (कैल्शियम कार्बाइड) से पके आमों की बाढ़ आई रहती है, लेकिन कुछ आसान तरीकों से आप असली और नकली (केमिकल वाले) आम की पहचान बहुत आसानी से कर सकते हैं। अगली बार जब आप आम खरीदने जाएं, तो इन 4 बातों का खास ध्यान रखें: 1. रंग की पहचान (सबसे आसान तरीका) केमिकल वाला आम: यह आम पूरी तरह से एक समान चमकीला पीला दिखेगा। इसमें कहीं भी हरापन नहीं होगा। ऐसा लगेगा जैसे किसी ने इस पर पीला रंग पेंट कर दिया हो। प्राकृतिक आम: यह आम पूरी तरह से एक रंग का नहीं होता। इसमें आपको कहीं पीला, कहीं हल्का हरा और कहीं लाल या नारंगी रंग के पैच (धब्बे) दिखाई देंगे। यह देखने में थोड़ा असमान लगता है। 2. पानी का टेस्ट (Floating Test) आम खरीदकर घर लाएं और उन्हें पानी से भरी एक बाल्टी में डाल दें: प्राकृतिक आम: जो आम पेड़ पर प्राकृतिक रूप से पकता है, वह भारी होता है और पानी में डालते ही नीचे डूब जाता है। केमिकल वाला आम: कार्बाइड से पकाए गए आम अंदर से थोड़े खोखले या कच्चे रह जाते हैं, इसलिए वे पानी के ऊपर तैरने लगते हैं। जो आम तैर रहा हो, उसे खाने से बचें। 3. दबाकर देखें (Texture) केमिकल वाला आम: इस आम को छूने पर यह कहीं से बहुत ज्यादा मुलायम (पिलपिला) लगेगा और कहीं से एकदम सख्त (कड़ा) लगेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि केमिकल इसे हर जगह से बराबर नहीं पका पाता। प्राकृतिक आम: इसे हल्के हाथों से दबाने पर यह हर तरफ से एक समान रूप से मुलायम और लचीला महसूस होगा। 4. काटने पर अंदर का रंग और स्वाद केमिकल वाला आम: जब आप इसे काटेंगे, तो यह बाहर से तो पीला दिखेगा, लेकिन अंदर से गुठली के पास का गूदा सफेद या हल्का पीला (कच्चा) निकलेगा। इसमें कोई खास खुशबू नहीं होगी और खाने पर यह हल्का खट्टा या बेस्वाद लगेगा। इसे खाने के बाद मुंह में हल्की जलन या कसैलापन महसूस हो सकता है। प्राकृतिक आम: काटने पर यह अंदर से पूरी तरह से गहरा पीला या केसरिया रंग का होगा। काटते ही पूरे कमरे में आम की सोंधी और मीठी खुशबू फैल जाएगी और इसका स्वाद बेहद मीठा होगा। सलाह: हमेशा कोशिश करें कि सीजन की शुरुआत में आने वाले बहुत ज्यादा चमकीले पीले आमों को खरीदने से बचें, क्योंकि उनमें केमिकल होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। सरकार कैल्सियम कार्बाइड से आम पकाने पर रोक क्यों नहीं लगाती ओर जो आम विदेश को निर्यात किए जाते है उसमें कौन कौन से केमिकल लगे होते है 1. सरकार कैल्शियम कार्बाइड पर रोक क्यों नहीं लगाती? यह एक बहुत बड़ा भ्रम है—भारत सरकार ने कैल्शियम कार्बाइड (जिसे आम बोलचाल में 'मसाला' कहते हैं) पर पूरी तरह से प्रतिबंध (Ban) लगा रखा है। कानून क्या है? भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के नियमों (Regulation 2.3.5) के तहत फल पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड या एसिटिलीन गैस का उपयोग करना एक दंडनीय अपराध है। अगर किसी व्यापारी के पास यह केमिकल मिलता है, तो उस पर भारी जुर्माना और जेल की सजा दोनों का प्रावधान है। फिर भी यह क्यों मिल रहा है? रोक होने के बावजूद इसके इस्तेमाल के पीछे मुख्य कारण लालच और ढीला कानून-पालन है। सस्ता और आसान: यह केमिकल बहुत ही सस्ता मिलता है और इससे आम 24 घंटे में पीले हो जाते हैं। जांच की कमी: देश की सभी छोटी-बड़ी मंडियों में हर रोज हर क्रेट की जांच करना फूड सेफ्टी अधिकारियों के लिए व्यावहारिक रूप से मुश्किल होता है। फार्मास्यूटिकल विकल्प का महंगा होना: सरकार ने इसके सुरक्षित विकल्प के रूप में "एथिलीन गैस" के इस्तेमाल की मंजूरी दी है (जो पेड़ पर प्राकृतिक रूप से बनती है)। लेकिन इसके लिए स्पेशल "राइपनिंग चैंबर" (पकाने वाले कमरे) बनाने पड़ते हैं, जिसमें ज्यादा खर्चा आता है, इसलिए छोटे व्यापारी चोरी-छिपे कार्बाइड का ही इस्तेमाल करते हैं। 2. विदेशों में निर्यात (Export) होने वाले आमों में कौन से केमिकल होते हैं? विदेशों (जैसे अमेरिका, यूरोप, जापान, या यूएई) में भेजे जाने वाले आमों के लिए नियम बेहद कड़े होते हैं। वहां बिना जांच के एक भी आम प्रवेश नहीं कर सकता। चौंकाने वाली बात यह है कि एक्सपोर्ट होने वाले आमों में केमिकल का इस्तेमाल ना के बराबर या बहुत ही नियंत्रित मात्रा में होता है। विदेशी मानकों को पूरा करने के लिए आमों को इन प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है: क) बीमारी और कीड़ों से बचाने के उपचार (Non-Chemical treatments) विदेशी सरकारें केमिकल से ज्यादा इस बात से डरती हैं कि भारत के आमों के साथ कोई कीड़ा (जैसे फ्रूट फ्लाई) उनके देश में न आ जाए। इसके लिए रसायनों के बजाय मशीनी तकनीकों का उपयोग होता है: वेपर हीट ट्रीटमेंट (VHT): आमों को गर्म भाप (लगभग 47°C) से गुजारा जाता है, जिससे उनके अंदर के कीड़े या अंडे मर जाते हैं। इसमें कोई केमिकल नहीं होता। हॉट वाटर इमर्शन (HWT): आमों को कुछ समय के लिए गर्म पानी में डुबोकर रखा जाता है। ख) फंगस से बचाव के लिए (Fungicides) समुद्र के रास्ते हफ्तों के सफर में आम सड़ न जाएं या उनमें फंगस (फफूंद) न लगे, इसके लिए बहुत ही सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत रसायनों का बेहद हल्का छिड़काव या वाश किया जाता है: कार्बेंडाजिम (Carbendazim) या थायाबेंडाजोल (Thiabendazole): यह एंटी-फंगल दवाएं होती हैं। इनका इस्तेमाल FSSAI और अंतरराष्ट्रीय मानकों (MRL - Maximum Residue Limit) के भीतर ही किया जाता है, जो इंसानों के लिए हानिकारक न हो। सोडियम हाइपोक्लोराइड (Sodium Hypochlorite): आमों को साफ करने और कीटाणुरहित करने के लिए बहुत ही हल्के घोल से धोया जाता है। ग) पकाने के लिए (Ripening agent) एक्सपोर्ट वाले आमों को पकाने के लिए सिर्फ और सिर्फ एथिलीन गैस (Ethylene Gas) का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक प्राकृतिक प्लांट हार्मोन है जो सुरक्षित माना जाता है। घ) चमक बढ़ाने के लिए (Waxing) आमों की नमी बरकरार रखने और वे ताजे दिखें, इसके लिए उन पर खाद्य मोम (Food-grade Wax) की एक बेहद पतली परत चढ़ाई जाती है, जो पूरी तरह सुरक्षित और खाने योग्य (Eatable) होती है। निष्कर्ष: विदेशों में जाने वाला आम भारत की आम मंडियों में मिलने वाले आमों से कहीं ज्यादा सुरक्षित और केमिकल-मुक्त होता है, क्योंकि वहां की सरकारें जरा सा भी प्रतिबंधित केमिकल (जैसे कार्बाइड) मिलने पर पूरा शिपमेंट रिजेक्ट कर देती हैं।

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